भारत से इंडिया तक और इंडिया का भारत से व्यवहार।
आज लाक्डाउन 3 का पहला दिन है ,आज सुबह जब अपने घर के आस-पास टहल रहा था, तो कुछ ऐसा दिखा कि जिससे मन व्यथित हो उठा।
लाक्डाउन 3 के समय में विभिन्न प्रकार की अफवाहें फैलती रहती हैंl इन अफवाहों से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है मजदूर, वह जो अलग-अलग
प्रांतों से आते हैं। पढ़े-लिखे ना होने की वजह से यह अफवाहों के मायाजाल में यूं ही फंस जाते हैं, अपने और अपने परिवार को मुश्किल में डाल देते हैं।
प्रांतों से आते हैं। पढ़े-लिखे ना होने की वजह से यह अफवाहों के मायाजाल में यूं ही फंस जाते हैं, अपने और अपने परिवार को मुश्किल में डाल देते हैं।
कुछ परिवार अपना बोरिया बिस्तर बांध सड़क पर जा रहे थे पूछा कि कहां जा रहे हो भैया तो बोलते वतन जा रहे हैं। बसें चालू हो गई है और घर
जाएंगे बाबूजी, लेकिन जब मैंने उनसे यह पूछा किसने बोला तो बोलते ऐसा सुनाई दिया है तब भी मैंने उन्हें यही समझाया कि प्रदेश सरकार ने
फोन हेल्पलाइन चलु की हुई हैं जिनका नंबर 1950 और 1100 है इन पर जब आप फोन करेंगे तो वह स्थानीय प्रशासन आपके जाने की व्यवस्था करेगा।
इसके बाद एक और दृश्य दिखा और यह घटनाक्रम दिल को छू गया जिसके बाद यह ब्लॉग लिखने की मन में आई।
जाएंगे बाबूजी, लेकिन जब मैंने उनसे यह पूछा किसने बोला तो बोलते ऐसा सुनाई दिया है तब भी मैंने उन्हें यही समझाया कि प्रदेश सरकार ने
फोन हेल्पलाइन चलु की हुई हैं जिनका नंबर 1950 और 1100 है इन पर जब आप फोन करेंगे तो वह स्थानीय प्रशासन आपके जाने की व्यवस्था करेगा।
इसके बाद एक और दृश्य दिखा और यह घटनाक्रम दिल को छू गया जिसके बाद यह ब्लॉग लिखने की मन में आई।
कल शाम को 3:00 बजे कोई 1215 मजदूर अपने बच्चों को लेकर ऐसी ही ब्रह्म जानकारियों की वजह से गुरुग्राम बस अड्डे की तरफ चल पड़े जहां पुलिस
ने उन्हें समझाया बुझाया कि यह सामान्य बस अभी नहीं चालू हुई है। जिसके उपरांत उन्होंने वापस, जिस साइट पर वह काम करते थे उसके पास छोड़ दिया।
लेकिन यहां शुरू हुआ उनकी किस्मत का दूसरा खेल और इसी की वजह से मैंने इस ब्लॉग का नाम भारत से इंडिया और इंडिया की भारत से व्यवहार रखा है।
(देहात, गरीब, मज़दूर को मैं भारत कह रहा हूँ और सम्पन, शहरी, आर्थिक दृष्टि समर्थ, MNC सभ्यता वालों को इंडिया)
ने उन्हें समझाया बुझाया कि यह सामान्य बस अभी नहीं चालू हुई है। जिसके उपरांत उन्होंने वापस, जिस साइट पर वह काम करते थे उसके पास छोड़ दिया।
लेकिन यहां शुरू हुआ उनकी किस्मत का दूसरा खेल और इसी की वजह से मैंने इस ब्लॉग का नाम भारत से इंडिया और इंडिया की भारत से व्यवहार रखा है।
(देहात, गरीब, मज़दूर को मैं भारत कह रहा हूँ और सम्पन, शहरी, आर्थिक दृष्टि समर्थ, MNC सभ्यता वालों को इंडिया)
जब सड़क पर बैठे मैंने उन्हें देखा! मैंने पास खड़े चौकीदार से पूछा कि यह लोग कैसे खड़े हैं तो उसने जवाब दिया कि साहब यह रात को चले गए थे और पुलिस
वाले ने देर रात छोड़ गए। तब मेरा उससे यह सवाल था कि यह लोग जिस साइट पर रहते हैं वहां क्यों नहीं गए? उसने आगे से जवाब दिया कि साहब
मैंने आरडब्ल्यूए प्रेजिडेंट से पूछा था और उन्होंने इनको अंदर आने की इजाजत नहीं दी। उसने आगे बताया कि उन्होंने जवाब दिया कि मुझे तंग मत कर सोने दे।
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि जिस जगह मैं रहता हूं वह एक प्लॉटेड कॉलोनी है जिसमें अलग-अलग ब्लॉक हैं और उसमें इन प्लॉटों पर, कुछ पर मकान
बने रहे होते हैं, (यह लेबर इन प्लॉटों पर काम कर रही थी)।
वाले ने देर रात छोड़ गए। तब मेरा उससे यह सवाल था कि यह लोग जिस साइट पर रहते हैं वहां क्यों नहीं गए? उसने आगे से जवाब दिया कि साहब
मैंने आरडब्ल्यूए प्रेजिडेंट से पूछा था और उन्होंने इनको अंदर आने की इजाजत नहीं दी। उसने आगे बताया कि उन्होंने जवाब दिया कि मुझे तंग मत कर सोने दे।
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि जिस जगह मैं रहता हूं वह एक प्लॉटेड कॉलोनी है जिसमें अलग-अलग ब्लॉक हैं और उसमें इन प्लॉटों पर, कुछ पर मकान
बने रहे होते हैं, (यह लेबर इन प्लॉटों पर काम कर रही थी)।
लेकिन मेरे मन में सवाल ही उठा कि इन्होंने तो अपने प्लॉट पर या उसके साथ बनी हुई जोगियों में या उस प्लॉट के अंदर बन रहे मकान के अंदर कहीं पर रहना है l
इससे किसी और के विचलित होने का क्या उद्देश्य? मुझसे नहीं रहा गया और मैंने फिर उस ब्लाक के प्रेसिडेंट को गार्ड से नंबर लेकर फोन करा सुबह के लगभग
6:00 बज रहे होंगे मैंने उनसे बड़ी विनम्रता से माफी मांगते हुए कहा कि सुबह-सुबह आपको तकलीफ दे रहा हूं लेकिन इस प्रकार का एक विषय आपके बिल्कुल
मुख्य गेट पर हो रहा है क्या आप इस से अवगत हैं? हाँ उन्होंने ,कहा ! और फिर बोले उन्होंने बोला कि देर रात उन्होंने गार्ड को यही बोला कि वह उनको सोने दें
और इनको (मज़दूरों) को भी भेज दें, ताकि यह भी सोए जिसको उस गार्ड ने शायद गलत समझ कर उन्हें, पूरी रात गेट के बाहर खड़ा रहने दिया।
इससे किसी और के विचलित होने का क्या उद्देश्य? मुझसे नहीं रहा गया और मैंने फिर उस ब्लाक के प्रेसिडेंट को गार्ड से नंबर लेकर फोन करा सुबह के लगभग
6:00 बज रहे होंगे मैंने उनसे बड़ी विनम्रता से माफी मांगते हुए कहा कि सुबह-सुबह आपको तकलीफ दे रहा हूं लेकिन इस प्रकार का एक विषय आपके बिल्कुल
मुख्य गेट पर हो रहा है क्या आप इस से अवगत हैं? हाँ उन्होंने ,कहा ! और फिर बोले उन्होंने बोला कि देर रात उन्होंने गार्ड को यही बोला कि वह उनको सोने दें
और इनको (मज़दूरों) को भी भेज दें, ताकि यह भी सोए जिसको उस गार्ड ने शायद गलत समझ कर उन्हें, पूरी रात गेट के बाहर खड़ा रहने दिया।
लेकिन बात यहीं पूरी हो जाती तो मन विचलित नहीं होता।
मेरी ब्लाक के प्रेसिडेंट के साथ वार्तालाप के बाद उन्होंने गार्ड को निर्देश दिए कि इन्हें अंदर आने दिया जाए। मेरे मन में थोड़ी सी शांति हुई थी चलो यह लोग
आराम से जाकर ले लेंगे भोजन करेंगे और बच्चे सड़क पर इधर-उधर नहीं पड़े रहेंगे और मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा। लेकिन कुछ समय बाद मेरे को एक
फोन आता है ! उसी ब्लॉक के प्रेसिडेंट का… बोलते हैं की- सामने वाले ब्लॉक के कुछ लोग उनको अंदर नहीं जाने दे रहे। कह रहे हैं कि वह बाहर गए थे और
अब अंदर जाना चाह रहे हैं, क्या पता इन्हें कोरोना का संक्रमण हो गया हो? … यहां पर नजर आता है भारत और इंडिया का व्यवहारिक मतभेद।
आराम से जाकर ले लेंगे भोजन करेंगे और बच्चे सड़क पर इधर-उधर नहीं पड़े रहेंगे और मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा। लेकिन कुछ समय बाद मेरे को एक
फोन आता है ! उसी ब्लॉक के प्रेसिडेंट का… बोलते हैं की- सामने वाले ब्लॉक के कुछ लोग उनको अंदर नहीं जाने दे रहे। कह रहे हैं कि वह बाहर गए थे और
अब अंदर जाना चाह रहे हैं, क्या पता इन्हें कोरोना का संक्रमण हो गया हो? … यहां पर नजर आता है भारत और इंडिया का व्यवहारिक मतभेद।
मुझको यह नहीं समझ में आता कि जब आप खुद बाजार जा सकते हैं!

अपने जरूरत का सामान लेके कुछ समय बाद घर वापस आ जाते हैं! घर आकर हाथ धोते हैं और हाथ धोने के उपरांत घर में घुस जाते हैं… वो ठीक है?
तो फिर गरीबों के साथ, मजदूरों के साथ इस तरीके का व्यवहार क्यों?
अगर घर से बाहर जाके वापिस आना इंडिया के लिए ठीक है!
घर आके हाथ धोने ओर सनिटीज़र मल्ल लेने से इंडिया को कोरोना संक्रमण नहीं होता, तो फिर ... दुष्प्रचार से ग्रसित जानकारी के चलते अगर भारत अपने घर
वापस जाने की कोशिश करता है, और उस में असमर्थ होकर वापस अपनी झुग्गी में आता है तो फिर उसको कोरोना का संक्रमण…कैसे ?
वापस जाने की कोशिश करता है, और उस में असमर्थ होकर वापस अपनी झुग्गी में आता है तो फिर उसको कोरोना का संक्रमण…कैसे ?
मैं मानता हूं कि सोशल डिस्टेंसिंग और भीड़भाड़ वाली जगह पर जाने से खतरा बढ़ जाता है और हो सकता है कि इन गरीब मजदूरों में से कुछ लोगों को कोई
संक्रमण हो भी सकता था। लेकिन संक्रमण तो पांच सितारा होटल में जाने वालों, बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने वालों, यहाँ तक कि कुछ राष्ट्र अध्यक्षों को भी हुआ
है तो…फिर ?
संक्रमण हो भी सकता था। लेकिन संक्रमण तो पांच सितारा होटल में जाने वालों, बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने वालों, यहाँ तक कि कुछ राष्ट्र अध्यक्षों को भी हुआ
है तो…फिर ?
गरीब को बार-बार उसकी गरीबी का एहसास दिलाना कुछ लोगों को अपने सामर्थ होने का सुखद भाव देता है। जिसके बाद उनके सोच-विचार में एक मादकता
हावी हो जाती है। बचपन में एक मुहावरा पड़ा था की “कनक कनक ते सौ गुना और मादकता अधिकाय एक पाए बोहराये जग एक खाये बोहराये”।
हावी हो जाती है। बचपन में एक मुहावरा पड़ा था की “कनक कनक ते सौ गुना और मादकता अधिकाय एक पाए बोहराये जग एक खाये बोहराये”।
गार्ड का मेरे पास फोन आया कि साहब वह बेचारे तो अपना बोरिया बिस्तर उठा कर कहीं निकल गए उनको उस ब्लाक के अंदर नहीं जाने दिया।
यह सुनकर मैंने अपने एक सहयोगी को फोन करा, पूरा विषय बताया, वह गुरुग्राम सिविल डिफेंस के अंदर अपना श्रमदान देते हैं। उन्होंने बड़ी विनम्रता पूर्व बोला
कि भाई साहब मुझे 10 मिनट दो मैं आता हूँ। अपनी गाड़ी में उन्होंने, तापमान देखने के लिए यंत्र, सैनिटाइजर वह डिसइन्फेक्शन स्प्रे पम्प हर समय साथ
रखा होता है। कुछ ही समय में उनका फोन आया कि भाई साहब यह लोग मिल गए हैं, और मैंने सभी का तापमान चेक करा लिया है, किसी को भी बुखार नहीं है।
फिर उन्होंने उन सभी को प्रवासी मज़दूरों केलिए सरकर द्वारा सारी व्यवस्थाएं समझाई। निकटतम रेलीफ़ कैम्प, बादशाहपुर में था। उन्होंने बताया कि “मैं सरकार
द्वारा बनाए गए प्रवासी मजदूरों के लिए विश्रामगृह ले जाकर इन सभी के रहने खाने का पूरा इंतजाम करवा दिया है , आप निश्चिंत हो जाइए अब सभी व्यव्यवस्थाएं
ज़िलाप्रशासन सम्भाल लेगा।
कि भाई साहब मुझे 10 मिनट दो मैं आता हूँ। अपनी गाड़ी में उन्होंने, तापमान देखने के लिए यंत्र, सैनिटाइजर वह डिसइन्फेक्शन स्प्रे पम्प हर समय साथ
रखा होता है। कुछ ही समय में उनका फोन आया कि भाई साहब यह लोग मिल गए हैं, और मैंने सभी का तापमान चेक करा लिया है, किसी को भी बुखार नहीं है।
फिर उन्होंने उन सभी को प्रवासी मज़दूरों केलिए सरकर द्वारा सारी व्यवस्थाएं समझाई। निकटतम रेलीफ़ कैम्प, बादशाहपुर में था। उन्होंने बताया कि “मैं सरकार
द्वारा बनाए गए प्रवासी मजदूरों के लिए विश्रामगृह ले जाकर इन सभी के रहने खाने का पूरा इंतजाम करवा दिया है , आप निश्चिंत हो जाइए अब सभी व्यव्यवस्थाएं
ज़िलाप्रशासन सम्भाल लेगा।
जब भारत कोरोना के समय मेहनत कर देश का पेट पालने के लिए खेती कर सकता है।
जब भारत, जिन भवनों में आप रहते हैं! उनको बनाने के लिए खून पसीना एक करता है।
जब उसी भारत के बच्चे सेना में भर्ती होकर, हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हैं।
तो क्या उसी भारत में से कुछ लोग जो संपन्न और सक्षम नहीं, क्या उनका इस तरीके से तिरस्कार सवाल पूछने पर विवश नहीं करता।
कि भारत से इंडिया तक और इंडिया का भारत से व्यवहार ऐसा कैसे हो गया?
You have explained a true incident and this is irony of our thinking.
ReplyDeleteBahut khoob likha hai. Hamain sabke prati samvedna rakhni chahiye
ReplyDeleteजैसा जिसको दिखाई देता है, उसके प्रति हमारा आचरण भी वैसा ही दिखाई पड़ता है ।
ReplyDeleteVery well written
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